खाद्य एवं पोषण सुरक्षा हेतु हेतु कृषिका द्वारा मशरूम की भूमिरहित खेती

                    वर्षा ऋतु में खेतों तथा जंगलों में कई स्थानों पर मशरूम उगते हैं । इन्हें आम भाषा में धमोड़ी, पिहुरी अथवा कुकुरमुत्ता कहा जाता है । प्राचीन काल से ही मशरूम की कई किस्मों में से खाने योग्य किस्मों का चुनवा, मानव करना सीख गया था एवं अपनी रसोई में इसका कई प्रकार से उपयोग करना प्रारंभ कर चुका था । किन्तु मशरूम की खेती का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । जहाँ पूर्व में मशरूम को बादल के गरजने से उपजने वाली वनस्पति के रूप में ही देखा जाता था, वहीं आज आधुनिक कृषि विज्ञान तथा तकनीक के कारण इसे वर्ष में छह से नौ महीने तक उगाया जा सकता है । विशेषकर, मशरूम की खेती हेतु श्रेष्ठ समय, वर्षा ऋतु होती है जब वातावरण में पार्याप्त मात्रा में नमी और उपयुक्त तापमान विद्यमान होता है.
      मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसकी खेती भूमि-हीन कृषक एवं मजदूर भी कर सकते हैं क्योंकि इसकी खेती के लिये भूमि की आवश्यकता नहीं होती है। मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ एक रोचक तथ्य यह भी है कि इसकी उपज मात्र 21 दिन से ही प्राप्त होनी शुरू हो जाती है । अत:, मशरूम की खेती, भूख से जूझ रहे परिवारों खाद्य एवं पोषण सुरक्षा हेतु बहुत महत्वपूर्ण है.
            राष्ट्र की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण प्रतिव्यक्ति कृषि भूमि का आकार निरंतर कम होता जा रहा है । जिस वजह से केवल कृषि कार्य करना ही लाभकारी सौदा नहीं रह गया है । इस परिस्थिति में समझदारी इस बात में है कि कृषि से संबंधित अन्य व्यवसायों में भी कृषक / महिला कृषक हाथ आजमाये, जैसे पशुपालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन एवं मशरूम की खेती ताकि प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हो सके ।
मशरूम की अर्थिक विवेचना:
मशरूम के एक थैले को तैयार करने में लगभग रू. 8/- से 10 /- की लागत आती है । एक थैले से लगभग दो से सवा दो किलो ताज़़ा मशरूम प्राप्त होता है । बड़े शहरों में मशरूम के विक्रय दर रू. 50/- से 60/- तक प्राप्त होती है जिससे रू. 40/-  से  50/- की शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है ।
            छोटे स्तर पर अपने परिवार की खाद्य सुरक्षा के लिये भी मशरूम की खेती की जा सकती है । चार से छह सदस्यों के परिवार के लिये, एक बार की सब्ज़ी का मूल्य लगभग रू. 12/- से 14/- तक होता है । यदि घर पर ही  मशरूम उगाया जाय तो 300 से 400 ग्राम मशरूम की सब्ज़ी प्रति पॅालिथिन थैला प्राप्त की जा सकती है । मशरूम के एक थैले से इस प्रकार घर पर उगाई गई मशरूम की सब्जी का सेवन करके रू. 50/- से 60/- तक बचत की जा सकती है । इस प्रकार, बचत के रूप में शुद्ध आय, रू. 40/- से 50/- तक प्राप्त की जा सकती है ।
            मध्यप्रदेश के डिंडोरी ज़िले के ग्राम स्तरीय हाट तथा बाज़ारों में मशरूम का विक्रय ग्रामीणजनों के बीच होता है तथा इसकी विक्रय ईकाई मुट्ठी है । एक मुट्ठी में लगभग 80 से 100 ग्राम मशरूम आता है  तथा ग्रामीण जन एक मुट्ठी मशरूम रू. 5/- में क्रय करते हैं । यह मशरूम, विक्रेतागण आसपास के जंगलों से एकत्रित कर हाट बाज़ार में विक्रय हेतु लाते हंै । ग्रामीणों के बीच मशरूम की स्वीकार्यता एक स्वादिष्ट सब्जी़ के रूप में है । मशरूम से, यह, रूचिकर व्यंजन पकाते हैं ।  यह मशरूम मात्र वर्षा ऋतु में ही जंगलों में उगते हैं अतएव इनका क्रय विक्रय तथा उपयोग अभी तक इस ऋतु तक ही सीमित है । हालाँकि बड़े शहरों में इसकी खेती वर्ष भर, तापमान तथा आद्रता (नमी) को नियंत्रित कर, की जाती है । हमारे ग्रामीण अंचलों में थोड़ी सी मेहनत से इसे आठ से दस महीने तक आराम से उगाया जा सकता है जिससे ग्रामीणजनों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा निश्चित की जा सकती है ।
            मशरूम, उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग में समान रूप से प्रचालित है, किन्तु शाकाहारी मध्यम वर्ग इसे अपनाने में थोड़ा समय ले रहा है ।  हालाँकि, इस वर्ग में यह धीरे-धीरे अपना स्थान बना रहा है ।  यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि मशरूम एक कवक है तथा इसको वनस्पति ही माना जाता है एवं यह किसी भी प्रकार से माँसाहार नहीं हैं । इस भ्राँति के निराकरण हेतु एक उदाहरण यह भी है कि गायात्री परिवार के प्रमुख संत आचार्य श्रीराम शर्मा जी के स्वयं लिखित वांगमय कोष क्रमांक 39 में इस बात का उल्लेख किया है कि मशरूम का उपयोग एक पौष्टिक सब्ज़ी के रूप में किया जाना चाहिए । नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ न्यूट्रिशन (आई.सी.एम.आर.), हैदराबाद के द्वारा प्रकाशित तथा सी. गोपालन तथा उनके साथियों द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘न्यूट्रिटिव वैल्यू आॅफ इंडियन फूड्स’’ (भारतीय खाद्य पदार्थों के पोषक मान) में भी मशरूम को सब्ज़ी (वनस्पति) की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है ।

मशरूम का पोषक मान: 
            सौ (100) ग्राम ताज़े मशरूम में 88.5 ग्राम जलांश (नमी), 3.1 ग्राम उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन, 0.8 ग्राम वसा, 1.4 ग्राम खनिज लवण, 0.44 ग्राम रेशा, 4.3 ग्राम कार्बोज़, 33 किलो कैलोरी ऊर्जा, 6 मिली ग्राम कैल्शियम, 110 मिली ग्राम फाॅस्फोरस, 1.5 मिल ग्राम लौह तत्व उपस्थित होता है ।
मशरूम की खेती हेतु आवश्यक सामग्री:
मशरूम की खेती हेतु निम्नलिखित सामग्री आवश्यक है:
भूसा, फार्मेल्डिहाईड, बैविस्टिन, मशरूम की बीज (स्पॉन ), 14×18 इंच आकार की पॉलिथिन, 4×3 मीटर आकार की पॉलिथिन शीट (उपचारित भूसा पलट कर अतिरिक्त उपचार घोल बहाने हेतु), सुतली, टोंचा, ब्लेड, 2 बड़ी बाल्टी या टब, 1 मग, पीने योग्य स्वच्छ जल, साबुन, साफ तौलिया एवं झारा ।
मशरूम की खेती हेतु आवश्यक बातें:
तापमान एवं आद्रर्ता (नमी):
मशरूम की खेती के लिये आवश्यक तापमान एंव आद्रर्ता वर्षा ऋतु के प्राकृतिक तापमान एवं आद्रता (नमी) के समान ही होनी चाहिए । यह लगभग 25 से 35 डिग्री सैल्सियस तथा 80 से 90 प्रतिशत आद्रता (नमी) होती है। वर्षा ऋतु में यह स्थिति प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रहती है किन्तु वर्षा के उपरांत इस स्थिति का निर्माण निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है :
1.      मशरूम के थैले को स्वच्छ एवं सुरक्षित, अंधेरे, हवादार तथा ठंडे कमरे में रख कर तथा फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर ।
2.      मशरूम के थैले को दिन में कम से कम पाँच से छह बार तथा रात में दो से तीन बार पानी से (झारे द्वारा) सींच कर/ तर करके ।
3.      मशरूम की खेती, जून माह में पहली वर्षा के उपरांत से लेकर फरवरी माह के अन्त तक, करके ।
4.      बडें स्तर पर घास की अथवा खस की झोपड़ी बना कर, झोपड़ी की घास को गीला रखते हुये, फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर, झोपड़ी के भीतर तापमान तथा आद्रर्ता को नियंत्रित करते हुये मशरूम की खेती करके ।

 मशरूम कक्ष की स्वच्छता:
1.      मशरूम कक्ष वह कक्ष है जिसमें मशरूम के थैलों की भराई तथा बीज रोपित किया जाता है एवं इन थैलों को टाँगा जाता है ।
2.      बाहर उपयोग किये गये जूते-चप्पल, कक्ष के बाहर उतारें तथा कक्ष में प्रवेश करने हेतु उपयोग की जाने वाली चप्पल पहनकर ही प्रवेश करें । 
3.      मशरूम के थैलों को हाथ लगाने के पूर्व, अपने हाथ साबुन तथा स्वच्छ जल के अच्छी प्रकार धोयें ।
4.      हाथ धोने के उपरान्त फार्मल्डिहाईड के दो प्रतिशत घोल से हाथ धोयें ।
5.      मशरूम कक्ष में कार्य खत्म करने के उपरान्त कक्ष से बाहर आकर साबुन तथा स्वच्छ जल से अच्छी तरह हाथ फिर से धोयें ।
6.      यदि कमरों का फर्श पक्का हो तो अच्छी तरह बुहार कर फिनाईल से पोछा लगायें ।
7.      दीवारों पर लगे जाले हटायें तथा दीवारों को बुहार लें ।
8.      फार्मल्डिहाईड 1 सें 2 प्रतिशत तथा बैविस्टीन का 0.05 प्रतिशत का स्वच्छ जल में घोल बनायें तथा इस घोल का छिड़काव दीवारों पर करें ।
9.      चूहे इत्यादि के बिल को बंद करें । चूहे तथा अन्य कीड़े के मशरूम कक्ष में प्रवेश को रोकने के लिये दरवाजे, खिड़कियों तथा दीवारों के सूराखों तथा दरारों को बंद करें ।
10.  यदि मशरूम कक्ष की छत खपड़े (कबेलू) की हो तो खपडे़ के नीचे, स्वच्छ चादर (पाल) लगायें जिसे समय पर धो लें।
11.  यदि फर्श कच्ची हो तो उसे गोबर से अच्छी प्रकार लीप लें ।
12.  फर्श (कच्ची या पक्की) का उपचार करने के उपरान्त, छनी हुई बारीक रेत की लगभग छह इंच की पर्त बिछायें जिससे मशरूम कक्ष में ठंडक बनी रहेगी ।
13.  कक्ष में चूहा पकड़ने का पिंजरा अवश्य रखें ।
14.  मशरूम का पॉलिथिन थैला भरते समय तथा मशरूम की तुड़ाई करते समय बालों को धुले हुये कपड़े से कस कर बाँधे तथा महिलायें अपनी चूड़ियों को धुले हुये कपड़े से हाथ पर बाँध लें ।
15.  अन्जान व्यक्ति, पालतू अथवा अन्य जानवारों का प्रवेश मशरूम कक्ष में वर्जित रखें ।

मशरूम की खेती हेतु स्वच्छता:
व्यक्तिगत् तथा स्थान की स्वच्छता, मशरूम की खेती हेतु अत्यंत आवश्यक है । ज़रा सी चूक के कारण ज़हीरले अथवा न जा खाने योग्य मशरूम अथवा नींदा उगने आरंभ हो सकते हैं । स्वच्छता बनाये रखने हेतु निम्नलिखित कार्य करने चाहिये:
व्यक्तिगत् स्वच्छता:
1.      नेलकटर द्वारा नाखून अवश्य काटें ।
2.      शरीर को खरोंचने, खुजली करने, बालों में हाथ फिराने, थूकने, छीकनें, खाँसने, नाक पोछने, तम्बाकू खाने, बीड़ी अथवा सिगरेट पीने, जैसी गंदी आदतों से दूर रहें ।
3.      अच्छी गुणवत्ता के साबुन तथा स्वच्छ जल से स्नान करें तथा स्वच्छ सूखी तौलियें से शरीर पोंछे ।
4.      दाद, खाज, खुजली, खाँसी, जु़खाम जैसे रोगों का उपचार करवायें ।
5.      कपड़े धोने के उचित गुणवत्ता के साबुन अथवा डिटेर्जेंट पाऊडर से धुले हुये कपड़े धारण करें ।
मशरूम की खेती की विधि:
भूसे का उपचार:
मशरूम की खेती हेतु भूसे का उपचार नीचे दी गई दो विधियों से किया जा सकता है:
गैर रासायनिक उपचार:
1.      बारीक़, अपने स्वाभाविक प्राकृतिक रंग के भूसे का चुनाव करें । जो कि रोग तथा कीट रहित हो तथा जिसमें लकड़ी, मिट्टी, कंकड़, पत्थर अथवा काँच के टुकड़े उपस्थित न हों । 
2.      भूसे को आधे घंटे तक स्वच्छ, पीने योग्य जल में उबालें । उबालने के उपरान्त जल निथार कर, भूसे को ठंडा कर लें तथा इसका उपयोग करें ।
रासायनिक उपचार:
1.      स्वच्छ बाल्टी में, स्वच्छ पीने योग्य जल में दो प्रतिशत फार्मल्डिहाईड तथा 0.05 प्रतिशत बाविस्टीन का घोल बनायें ।
2.      इस घोल में भूसे को अच्छी, तरह डुबाकर, 12 घंटे तक रखें  ।
3.      बारह घंटे के उपरान्त भूसे को पानी से निकालकर ढाल वाले, छायादार तथा स्वच्छ स्थान पर पॉलिथिन शीट पर रखें । इस पॉलिथिन शीट को उपयोग करने के पूर्व, से उपचारित करें. ।
4.      पॉलिथिन शीट पर पर फैले हुये भूसे को दो घंटे तक रखें जिससे भूसे में उपस्थित अतिरिक्त उपचार घोल बहकर भूसे से अलग हो जाये।
स्पॉन  (बीज) रोपित करना:
1.      स्वच्छ तथा उपचार घोल से उपचारित एवं निथरे हुये पॉलिथिन बैग (लिफाफें) में दो अंगुल की भूसे की पर्त बिछायें।
2.      पर्त के ऊपर लिफाफे के किनारे मशरूम का बीज फैलायें ।
3.      बीज फैलाने के उपरांत, दो अंगुल ऊँची उपचारित भूसे की पर्त फैलायें ।
4.      इस पर्त के ऊपर पुनः मशरूम के बीज रोपित करें ।
5.      इस प्रकार पॉलिथिन ऊपर तक भर लें ।
6.      ऊपर तक भरने के उपरान्त पॉलिथिन बैग का मुँह सुतली से कस कर बाँध दे ।
मशरूम के थैले में छेद करना तथा टाँगना:
1.      उपचार घोल से उपचारित, सूखे टोंचे से पॉलिथिन बैग में छोटे-छोटे छेद, चारों ओर करें ।
2.      भरे हुये बैग को चारों ओर से सुतली से बाँधें तथा ऊपर की ओर सुतली का एक लूप बनायें ।
3.      सुतली के लूप के द्वारा इस बैग को इतनी ऊँचाई पर बाँधें, जितनी ऊँचाई पर आसानी से इन्हें सींचा जा सके तथा साथ ही यह बच्चों की पहुँच तथा पालतू जानवर एवं चूहों से दूर भी रहें ।
4.      स्वच्छ पीने योग्य जल को स्वच्छ झारे में भर कर पॉलिथिन बैग को दिन में पाँच से छह बार तथा रात में कम से कम तीन बार सीचें ।
5.      वर्षा ऋतु के उपरान्त, शुष्क मौसम में प्रति चैबीस घंटे, दो से तीन सिंचाई बढ़ायें ।
6.      व्यवसायिक स्तर पर मशरूम की खेती करने की स्थिति में, टपक सिंचाई पद्धति (ड्रिप इरिगेशन) का उपयोग भी मशरूम बैग की सिंचाई के लिये किया जा सकता है ।
7.      मशरूम की व्यवसायिक खेती की लिए हार्ड वाटर (लवण युक्त जल अथवा खारे पानी) का उपयोग न करें बल्कि मीठे जल का उपयोग करें ।

मशरूम के पॉलिथिन थैले को फाड़ना:
1.      माशरूम के पॉलिथिन थैले को भरने के इक्कीस दिन के उपरान्त (भूसा सफेद हो जाने के उपरान्त), उपचार घोल से उपचारित तथा सूखे हुये ब्लेड से, इस बैग को फाड़े तथा पॉलिथिन थैले को बाँधे हुये भूसे से अलग करें ।
2.      सुतली को भूसे के चारों ओर बँधे रहने दें जिसके द्वारा वह हवा में टँगा रहेगा ।
3.      सफेद रंग के बँधे तथा टंगे हुये भूसे को पहले की तरह ही सींचते रहें ।
मशरूम की फसल:
1.      मशरूम के पॉलिथिन थैले को भरने सेे पच्चीस से तीस दिन के पश्चात् मशरूम उगने प्रारंभ हो जायेगें ।
2.      मशरूम, फूल के रूप मे उगेगे जो कि सफेद रंग के होगें ।
3.      मशरूम के किनारे, जैसे ही बाहर की ओर मुड़ने आरंभ हों तथा किनारों का रंग भूरा होना प्रारंभ हो जाये, इन्हें घड़ी की दिशा में घुमा कर तोड़ लें ।
4.      ताजे मशरूम का उपयोग सब्ज़ी, भजिये, सूप एवं अचार आदि बनाने में करें ।
5.      बाद में उपयोग में लाने के लिये, मशरूम को धूप मे सुखा कर साफ वायुुरूद्ध डिब्बों में बंद करें ।
6.      मशरूम के जो फूल सफेद रंग के अतिरिक्त, अन्य रंग के हों उन्हें देखते ही, तुरंत तोड़ लें तथा मशरूम कक्ष के बाहर ले जा कर इन्हें नष्ट करें ।
7.      अनावश्यक किस्म के मशरूम (सफेद रंग के अतिरिक्त रंग के मशरूम) तथा भूसे में संक्रमण दिखने की स्थित में, स्वच्छ जल में तैयार 2 प्रतिशत बैवेस्टीन के घोल का छिड़काव मशरूम थैले पर करें ।
8.      एक बार में, मशरूम के एक थैले से एक तुड़ाई के दौरान 300 से 400  ग्राम की उपज प्राप्त होती है । प्रत्येक बैग 4-5 तुड़ाई तक की जा सकती है ।
मशरूम सुखाने की विधि:
1.      एक लीटर स्वच्छ पीने योग्य जल को उबालें लें तथा ठंडा कर लें । इस जल में एक तिहाई चाय के चम्मच के बराबर पोटैशियम मैटा बाइ सल्फाईट (के.एम.एस.पावडर) प्रति लीटर, अच्छी प्रकार मिलायें । इस घोल में मशरूम को पाँच मिनिट के लिये डुबायें ।
2.      घोल से मशरूम निकालकर, स्वच्छ स्थान पर, स्वच्छ पॉलिथिन शीट पर बिछा कर धूप में दो दिन तक सुखायें ।
3.      सूखे हुये मशरूम को वायुरूद्ध डिब्बे (ऐसे डिब्बे जिनमें हवा न जा सके ) में बंद कर के सुरक्षित स्थान पर रखें । जब आवश्यकता पड़ने पर सेवन करें. 


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