सोयाबीन की उत्पादन तकनीक

लेखकगण: डॉ. ए. एन. श्रीवास्तव, स्तुति मिश्रा, डी. के. पंचेश्वर एवं डॉ. आर. के. वर्मा
पौध प्रजनन एवं अनुवांशिकी विभाग, कृषि महाविद्यालय-जबलपुर
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्विविद्यालय, जबलपुर

डॉ.ए.एन.श्रीवास्तव
मो: 9229474253
ई.मेल:ans_jnkvv@rediffmail.com
आज सोयाबीन की खेती का मध्य प्रदेश  में जो अद्वितीय विस्तार हुआ है, उसका श्रेय वर्ष 1965 से आज तक अनवरत् किये गये विभिन्न अनुसंधान कार्यों को जाता है। जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय में वर्ष 1967 से अखिल भारतीय समन्वयक परियोजना द्वारा उन्नत तथा विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल अधिक उपज व उच्च गुण्वत्ता  वाली जातियों तथा उन्नत शस्य एवं पौध संरक्षण तकनीकों के विकास ने सोयाबीन की खेती के नये आयाम खोल दिये। इसके साथ ही कृषकों का सोयाबीन खेती के प्रति झुकाव, तेल उद्योग की स्थापना एवं सरकार द्वारा तैयार वातावरण ने सोयाबीन खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।  वर्तमान में सोयाबीन देश में तिलहनी फसलों में प्रथम स्थान पर स्थापित हो गयी है। इसमें  प्रचुर मात्रा में उच्च कोटि का प्रोटीन 43.2 प्रतिशत एवं तेल 20 प्रतिशत पाया जाता है। इसके अलावा इसमें विटामिन एवं खनिज लवण की मात्रा भी अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक पायी जाती है।
उत्पादकता को प्रभावित करने वाले कारकः
तथ्यों से स्पष्ट है कि सोयाबीन मध्य प्रदेश  में खरीफ मौसम में बहुत अधिक क्षेत्र में उगाई जाती है। खरीफ फसल के रुप में इसकी उपयुक्तता एवं आर्थिक लाभ ने किसानों को आकर्षित किया है। जिससे खरीफ में जो भी पड़ती ज़मीन रहती थी उसको आच्छादित किया एवं कई परंपरागत खरीफ फसलों को भी विस्थापित कर गौण कर दिया । किसानों ने आर्थिक लाभ से प्रभावित होकर धान के खेतों की मेड़ें तोड़ कर सोयाबीन खेत में बदला एवं सीमांत ज़मीन में भी खेती करने लगे। इस प्रकार सोयाबीन मध्य प्रदेश के वृहद् क्षेत्र में उगाई जाने लगी है।
वर्तमान में सोयाबीन उत्पादन को सीमित करने वाली प्रमुख समस्यायें निम्न हैं: 
1.      जड़ सड़न, एवं पीला मोज़ैक जैसे रोग एवं कीटों का व्यापक प्रकोप.
2.      भूमि में आवश्यक मुख्य तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का असंतुलन.
3.      भूमि में कार्बनिक पदार्थ की कमी.
4.      समुचित जल प्रबंध का अभाव.
5.      खरपतवार की समस्या.
जलवायु एवं उपयुक्त क्षेत्र:
सोयाबीन मध्य प्रदेश की प्रमुख खरीफ फसल है जिसकी खेती जून से अक्टूबर के बीच की जाती है। इसकी खेती प्रदेश में ओैसतन 750-800 मि.मी.; पश्चिमी एवं उत्तरार्ध से लेकर 1000 - 1200 मि. मी.; दक्षिण एवं पूर्व के वर्षा वाले कृषि जलवायु क्षेत्र  में की जाती है । फसल की उत्पादकता को वर्षा की कुल मात्रा एवं वितरण, तापक्रम एवं आद्रता अत्याधिक प्रभावित करते हैं।
वर्तमान में इसकी खेती विभिन्न प्रकार की भूमि जैसे उथली, काली से गहरी काली ;मालवा की मध्यम काली ;विन्ध्य पठार की गहरी काली ;मध्य नर्मदा धाटी की हल्की काली दोमट एवं सिल्टी दोमट  ;सतपुड़ा पठार की रेतीली दोमट से भारी काली; कैमोर पठार की लाल काली  मिश्रित; बुन्देलखण्ड की मिलवा लाल काली एवं  दोमट; गिर्द एवं उथली काली ;निमाड़ धाटी की ज़मीनों में होती है।
भूमि का चयन एवं तैयारी:
सोयाबीन, अम्लीय क्षारीय तथा रेतीली भूमि को छोड़कर हर प्रकार की मिट्टी में पैदा होती है। सोयाबीन की खेती उन खेतों में ही करें जहाँ जलभराव एवं मृदाजनित बिमारियों की समस्या न हो। रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद गर्मी में गहरी जुताई करें। ग्रीष्म कालीन जुताई से ज़मीन के नीचे आश्रय पाने वाले कीटों एवं बीमारियों के अवशेष नष्ट हो जाते हैं तथा  भूमि की जलधारण क्षमता एवं दशा में सुधार होता है । गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट को खेत में समान रूप से छिड़कने के बाद बोनी के लिए जुताई करें । खेत  की मिट्टी भुरभुरी हो जाये एवं खरपतवार नष्ट हो जायें इस प्रकार जुताई करें। बुवाई के पूर्व खेत के निचले हिस्से में जल निकास नाली का निर्माण अवश्य करें ।
बुवाई का समय:
सोयाबीन की बुवाई 20 जून से 30 जुलाई (जे.एस. 97-52), 0 जून से 5 जुलाई (जे.एस. 335, जे.एस. 93-05, जे.एस. 20-29, जे.एस. 95-60, जे.एस. 20-34) के बीच उत्तम परिणाम देती है । इसमें परिस्थितिवश बुवाई कुछ दिन आगे पीछे होना कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता । मानसून में देर होने पर जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हों, बुवाई समय से ही करें ।
उत्तम बीज व बीज दर:
सोयाबीन की बीज दर 60 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर (जे.एस. 97-52), 70-75 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर  (जे.एस. 335, जे.एस. 93-05, जे.एस. 20-29, जे.एस. 95-60, जे.एस. 20-34) की दर से बुवाई करें। सोयाबीन बीज की अंकुरण क्षमता 70 प्रतिशत से अधिक हो एवं अनुवांशिक रूप से पूर्णत: शु़द्ध हो वही बीज प्रयोग करें ।
बीजोपचार:
बीज को फफूँदनाशक दवा थायरम एवं कार्बेन्डाज़िम को 2:1 के अनुपात  में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो बीज अथवा ट्राईकोडर्मा नामक जैविक फफूँदनाशक  की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें । जहाँ पर तना मक्खी, सफेद मक्खी एवं पीला मोज़ैक की समस्या अधिक हो वहाँ पर थायोमेथोक्ज़ाम 70 डब्ल्यू. एस. नामक कीटनाशक से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचारित कर सकते हैं । फफूँदनाशक एवं कीटनाशक दवा के उपचार के पश्चात् 5 ग्राम राइज़ोबियम कल्चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. कल्चर से प्रति किलो बीज उपचारित करने से सोयाबीन में जड़ ग्रन्थियों का उचित विकास होता है ।
उर्वरक एवं खाद:
भूमि की भौतिक दशा एवं गुणों को बनाये रखने के लिए 10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट अथवा ५ टन फसलों का बारीक़ किया हुआ भूसा और 5 टन कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर का उपयोग अच्छा परिणाम देता है । जहाँ पर मृदा परीक्षण के उपरान्त ज़िंक एवं बोरॉन तत्व की कमी पाई जाये, वहाँ ५ कि.ग्रा ज़िंक (25 कि.ग्रा. ज़िंक सल्फेट) एवं 1 कि.ग्रा. बोरॉन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभकारी है ।
गंधक की कमी होने पर फॉस्फोरस की पूरी मा़त्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में देने पर यह कमी पूरी हो जाती है या जिप्सम २-२.५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपयोग करने से भी गंधक की कमी पूरी हो जाती है।
इसके अलावा सामान्यतयाः 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन, 60-80 कि. ग्रा. फॉस्फोरस एवं 20 कि.ग्रा. पोटाश की मात्रा आवश्यक  रूप से उपयोग करें ।
बुवाई का तरीका:
सोयाबीन की बुवाई कम उॅँचाई वाली जातियों या कम फैलने वाली जातियों को 30 से.मी. (जे.एस. 95-60, जे.एस. 20-34) तथा (जे.एस. 335, जे.एस. 93-05, जे.एस. 97-52, जे.एस. 20-29 ) की कतार से कतार की दूरी पर बोयें । कतार से कतार की दूरी ४५ से.मी. होना चाहिए। बुवाई का कार्य दुफन, तिफन या सीड ड्रिल से ही करें । बुवाई के समय ज़मीन में उचित नमी आवश्यक  है । बीज को ज़मीन   में 2.5 से 3 से. मी. गहराई पर बोयें। मेंढ़ - नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी - नाली विधि  से बुवाई करनें से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि होगी एवं नमी संरक्षण जल निकास में लाभ होगा।
अंकुरण के बाद फसल की सुरक्षा:
बुवाई के तीसरे दिन से एक सप्ताह तक अंकुरित नये पौधों को पक्षी नुकसान पहुँचा सकते हैं. इन पौधों की सुरक्षा करें.
पौधों की प्रति हेक्टेयर संख्या:
सोयाबीन में अधिक फैलने वाली जातियों की 3 से 4 लाख के आसपास पौध संख्या एवं कम फैलने वाली जातियों की 4 से 6 लाख पौध संख्या प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। वांछित पौध संख्या अधिक होने पर फसल के ढहने की सम्भावना रहती है एवं फूल तथा फलियाँ प्रकाश के आभाव में सड़ जाती हैं तथा कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों का छिड़काव भी असरकारक नहीं होता है।
जल प्रबंध:
सोयाबीन की फसल में यदि उचित जल प्रबंध नही है, तो जो भी आदान दिया जाता है उसका समुचित उपयोग पौधों द्वारा नहीं हो पाता है । इसके साथ ही जड़ सड़न जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है एवं नींदा नियंत्रण कठिन हो जाता है जिसके फलस्वरूप, पौधों का विकास सीमित हो जाता है एवं उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। अतः सामान्य तरीके से बुवाई के बाद 20-20 मीटर की दूरी पर ढाल के अनुरूप जल निकास नालियाँ अवश्य बनायें, जिससे अधिक वर्षा की स्थिति में जलभराव न हो। मेढ़ - नाली विधि एवं चौड़ी पट्टी - नाली विधि से बुवाई करें एवं जल भराव की समस्या का निराकरण करें।
यदि एक सप्ताह से अधिक वर्षा का अन्तराल हो जाये तो सिंचाई की सुविधा होने पर हल्की सिंचाई इन्हीं नालियों के माध्यम से करें। उचित जल प्रबंध से सोयाबीन की पैदावार में वृद्धि होगी।
खरपतवार नियंत्रण:
सोयाबीन में विभिन्न प्रकार के घास कुल के एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार फसल के साथ जल एवं पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं जिससे पैदावार में कमी आ जाती है। अतः 20-25 दिन में फसल से हाथ से निन्दाई करें । मजदूरों की कमी, वर्षा का अंतराल एवं ज़मीन की स्थिति से, खरीफ के मौसम में हाथ की निंदाई कभी कभी कठिन हो जाती है अतः यांत्रिक विधियों में सी.आई.ए.ई. भोपाल द्वारा निर्मित उन्नत हैन्ड हो या बैल चलित कुल्पा या डोरा का निंदाई हेतु उप्योग करें। आवश्यकतानुसार रासायनिक  नींदानाशकों का उपयोग भी कर सकते हैं।
इन नींदानाशकों को निम्नानुसार तीन समूहों में बाँटा गया है:
1. बोनी से पूर्व उपयोग में लाये जाने वाले नींदानशक:
फलूक्लोरालिन ४५ ई.सी. की १-१.५ कि. ग्रा. क्रियाशील अवयव या ट्राइफ्लूरालिन 48 ई.सी. की १ कि. ग्रा. क्रियाशील अवयव प्रति हेक्टेयर बोनी से पूर्व नम मिट्टी में छिड़कें।
2. बोनी से बाद एवं अंकुरण से पूर्व उपयोग में लाये जाने वाले नींदानाशक:
पेन्डिमिथालिन 3 ई.सी. 1 कि. ग्रा. क्रियाशील अवयव या मेटलाक्लोर 50 ई.सी. 1 कि.ग्रा. क्रियाशील अवयव या क्लोमेज़ॉन 50 ई.सी. 1 कि.ग्रा. क्रियाशील अवयव, प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोनी के बाद एवं अंकुरण के पूर्व छिड़काव करने से खरपतवार नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है ।
 3. बोनी के बाद उपयोग में लाये जाने वाले नींदानशक:
सोयाबीन की बोनी के 15-20 दिन के बीच खड़ी फसल में इमेजीथापिर नामक दवा का 100 ग्राम क्रियाशील अवयव या क्वीज़ॉलोफॉप इथिल 50 ग्राम क्रियाशील अवयव या क्वीजालोफ़ॉप- पी-टेफूरिल 44.1 ग्राम क्रियाशील अवयव या फेनोक्साप्रॉप 10 ई.सी. 70 ग्राम क्रियाशील अवयव या क्लोरिम्यूरान इथिल 9 ग्राम क्रियाशील अवयव प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें । इन दवाओं को 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव स्प्रेयर में फ्लड जेट नॉज़ल या फ्लैट पैन नॉज़ल लगाकर करें। भूमि में नमी रहने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
बीमारियों का नियंत्रण:
सोयाबीन में मुख्य रूप से पीला मोज़ैक, जड़ सड़न एवं गेरूआ जैसी बीमारियों का प्रकोप अधिक देखा गया है । जड़ सड़न के लिए बीजोपचार जो पहले बताया गया है उसे करें। पीला मोज़ैक जो सफेद मक्खी द्धारा फैलता है, जिसका नियंत्रण करने से यह रोग नहीं फैल पाता है । सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए पहले जो बीजोपचार बताया गया है, उसे करें। थायामेथोक्जाम 25 डब्ल्यू.पी.,100 ग्राम/हेक्टेयर का छिड़काव करें तथा रोगी पौधे जैसे ही दिखाई पडे़ उन्हें उखाड़कर नष्ट कर दें। अधिक वर्षा की अवस्था में पर्णीय  फफूँद जनित बीमारियों से बचाव के लिए कार्बंडाज़िम या थायोफेनेट मिथिल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें।
बैक्टीरियल पस्च्यूल की समस्या होने पर कासुगेमेसिन 0.2, कॉपर आक्सीक्लोराइट 0.2, या स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 200 पी.पी.एम. का छिड़काव करें ।
गेरूआ रोग से बचाव के लिए हेक्ज़ाकोनेज़ोल 5 ई.सी. या प्रोपाकोनेज़ॉल 25 ई.सी. या ट्राईएडमिफॉन २५ डब्ल्यू.पी. 0.1 प्रतिशत रोग के लक्षण दिखते ही तुरंत 0.1 प्रतिशत की दर से 40-45 दिन की फसल होने पर छिड़काव करें। इस छिड़काव से पौधे पूरी तरह भीगने चाहिये तथा 500-700 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें । आवश्यकतानुसार 15-20 दिन में छिड़काव दोहरायें ।
कीट नियंत्रण:
सोयाबीन फसल में कई कीटों का प्रकोप विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है। इन कीटों में तने की मक्खी व चक्रभृंग (तना छेदक कीट), अर्ध कुन्डलक इल्ली, कम्बल कीट, तम्बाखू की इल्ली, अलसी की इल्ली, चने की फली छेदक (पत्ती भक्षक कीट), एवं सफेद मक्खी, जेसिड्स, माइट्स् और थ्रिप्स् (रस चूसक) प्रमुख हैं।
इनके नियंत्रण के उपाय निम्नलिखित हैं:
1.      फेरोमोन ट्रैप्स लगाने से वयस्क कीट (उड़ने वाले) आकर्षित होकर ट्रैप में गिर जाते हैं  जिससे इल्लियों जैसे कीटों का नियंत्रण सम्भव है।
2.      तम्बाखू की इल्ली, एवं कम्बल कीट के नियंत्रण के लिए प्रभावित पौधों से अण्डगुच्छ एवं लार्वीगुच्छ वाली पत्तियों को एकत्र कर नष्ट कर दें। जब हम खेत का निरीक्षण करते हैं तब कागज़ की तरह या जालीदार पत्तियाँ जैसे ही दिखें वहाँ पत्तियों के नीचे अण्डगुच्छ या लार्वीगुच्छ मिल जायेंगे, इस प्रकार की पत्तियों या पूरे पौधे को धीरे से इकट्ठा करें एवं बोरी में डालते जायें तथा अन्त में खेत से बाहर लाकर नष्ट कर दें। जिस जगह पर इस प्रकार की पत्तियाँ मिलें उसके चारों तरफ कीटनाशक का छिड़काव तुरंत करें।
3.      तना छेदक मक्खी एवं सफेद मक्खी: फोरेट 10 जी. दानेदार दवा को 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई के समय मिट्ठी में मिला दें। या थायामेथोक्ज़ैम 70 डब्ल्यू.एस. 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से बोनी पूर्व बीज उपचारित करें।
4.      गर्डल बीटल, चक्रभृंगद्ध एवं पत्ती छेदक: ट्रायज़ोफॉस 40 ई.सी. दवा 800 मि.ली.  प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें। या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी., 300 मि.ली. प्रति हेक्टेयर या इथोफेनप्राक्स 10 ई.सी. 1 लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।
5.      पत्ती भक्षक कीट: स्पायनोसैड 45 एस.सी.125 मि.ली. प्रति हेक्टेयर या रायनेक्सीपीर 20 एस.सी. 100 मि.ली. प्रति हेक्टेयर या क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. या क्यूनालफास 25 ई.सी. या इन्डोक्साकार्ब 15 ई.सी.300 मि.ली.  प्रति हेक्टेयर या मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।
6.      जेसिडस, एफिड, माइटस् से सुरक्षा हेतु इथियान 50 ई.सी. दवा की 1.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर के  हिसाब से छिड़काव करें ।
7.      तना मक्खी एवं सफेद मक्खी: थायामेथोक्जाम 25 डब्ल्यू.जी.100 ग्राम प्रति हेक्टेयरया इथोफेनप्राक्स 10 ई.सी.की 1 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।  
जैविक कीटनाशक:
1.      बैवेरिया बेसियाना या बीटी, 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करनें से पत्ती भक्षक इल्लियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
2.      एच.ए.एन.पी.व्ही. ध् एस.आई.एन.पी.व्ही.की 250 एल.ई. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से भी पत्ती भक्षक कीटों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
लाभकारी अंर्तरवर्तीय फसलें:
·        सोयाबीन : मक्का - 4 कतार: 2 कतार
·        सोयाबीन : अरहर  - 4 कतार: 2कतार
·        सोयाबीन : ज्वार   - 4 कतार: 2 कतार
·        सोयाबीन : कपास  -4 कतार: 1 कतार
लाभकारी फसल चक्र:
सोयाबीन-गेहूँसोयाबीन-अलसीसोयाबीन-चनासोयाबीन-आर्किल मटर.
कटाई, गहाई एवं भंडारण:
सोयाबीन की कटाई हँसिया या मशीन से की जाती है। फसल की कटाई तब करें जब 95 फलियाँ भूरी पड़ जायें और पत्तियाँ झड़ जायें । अधिक देरी से कटाई करने पर चटकने की संभावना रहती है। बीज वाली फसल की कटाई कम्बाईन हार्वैस्टरसे न करें। यदि कटाई के समय वर्षा की संभावना हो तो कटाई रोक दें। फसल के गट्ठों को दो तीन दिन तक खेत में सूखने के बाद खलिहान में ले जायें । गहाई थ्रेशर मशीन से करने के लिये सूखी हुई फसल की गंजियाँ बना लें। थ्रेशर की की गति 300-500 आर.पी.एम. एवं पंखे की गति 1400-1500 आर.पी.एम. रखें। ट्रैक्टर से गहाई के लिए खलिहान में फसल की मोटी पर्त बिछा दें और सूखने के लिए छोड़ दें । जब फल्लियाँ चटकने लगें तब नये टायर वाले ट्रैक्टर से धीमी गति से गहाई करें। गहाई हो जाने पर तेज़ हवा में या पंखों से उड़ावनी कर बीजों को डंठल एवं भूसा से अलग करें। बीज को पुनः धूप में 2 से 3 दिनों तक सुखाकर एवं छानकर भंडारण सूखे एवं ठंडे स्थानों में कोठियों एवं बोरों में करें। भण्डारण के लिए बीज में 9 प्रतिशत के आस-पास नमी सर्वथा उपयुक्त होती है । बीजों को साफ सुथरी बोरियों में भरें । बोरियों की सिलाई के बाद उन्हें 6 बोरियों तक की छल्ली लगायें । भण्डार गृह में ताप और नमी का प्रभाव न पड़े ऐसी व्यवस्था रखें । भण्डार में अन्य जाति के बीज पास में न हों ऐसा प्रबन्ध करें । भंडार गृह में बीज की सुरक्षा चूहों से करें। यदि किसान भाई बीज के लिए सोयाबीन लगा रहें तो बुवाई से भंडारण तक सावधानी बरतें ।
 सोयाबीन की उन्नत खेती हेतु महत्वपूर्ण सुझाव:
1.         सोयाबीन की खेती  उपयुक्त ज़मीन में ही करें ।
2.         ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें ।
3.         मृदा परीक्षण कर प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा का पता लगायें तदानुसार उर्वरक डालें।
4.         दस टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से गोबर खाद कम्पोस्ट या 5 टन बारीक भूसा और 5 टन कम्पोस्ट का उपयोग करें । गंधक एवं जस्ते की कमी को पूरा करें।
5.         खेत में जल निकास एवं सिंचाई की समुचित व्यवस्था करें ।
6.         बुवाई 25 जून से 7 जुलाई के मध्य करें  ।
7.         हल्की से मध्यम भूमि में कम अवधि की तथा मध्यम से भारी भूमि में मध्यम अवधि   की किस्में लगायें। एक से अधिक किस्मों को लगायें ।
8.         बोनी हेतु स्वस्थ, सुडौल, साफ एवं 70 प्रतिशत से अधिक अंकुरण क्षमता वाला बीज प्रयोग करें ।
9.         बीज दर 60 - 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपयोग करें ।
10.     आवश्यक पौध संख्या 4-6 लाख प्रति हेक्टेयर के मध्य रखें।
11.     नींदा, रोग एवं कीट व्याधियों का सही समय पर, सही दवा तथा सही विधि द्वारा नियंत्रण करें। फसल कटाई समय से करें।
12.     सोयाबीन के साथ अरहर, मक्का, ज्वार, कोदो, कुटकी की अंर्तरवर्तीय फसल लगायें। उचित फसल चक्र अपनायें। कृषक स्वयं अपना उन्नत बीज उत्पादित करें।
जे.एस. 335
यह व्यापक क्षेत्र के लिए अनुकूल है । यह प्रजाति विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अधिक उपज देने की क्षमता रखती है। इसकी उपज क्षमता 25-30 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर है । इसमें उच्च अंकुरण क्षमता के साथ ही साथ चटकने के प्रति रोधिता है। यह प्रजाति बेक्टीरियल पश्च्यूल के प्रति प्रतिरोधी है। इसके फूलों का रंग बैगनी, तना एवं पत्ती रोयें रहित होते हैं। यह शीध्र से मध्यम समय में पकने वाली तथा मध्यम आकार के दाने वाली प्रजाति है। इस प्रजाति के आने से सोयाबीन की खेती में बहुत अधिक विस्तार हुआ।     
जे.एस. 93-05
यह व्यापक क्षेत्र के लिए अनुकूल है। यह जाति शीध्र पकने वाली (90-95 दिन) प्रजाति है। इसकी उपज क्षमता 25-30 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर है । इसकी फलियाँ चार दाने वाली, पत्तियाँ भालाकार, बैंगनी फूल, रोम रहित तना, पत्ती तथा फली, पीला दाना एवं नाभिका गहरी काले रंग की होती  है । इसमें उच्च अंकुरण क्षमता के साथ ही साथ चटकने के प्रति रोधिता है। इस प्रजाति में सूखा सहन करने की क्षमता है। इसमें महत्वपूर्ण रोग एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधिता/सहनशीलता है। इसके पौधे सीधे होने के कारण यह अंर्तवत्र्तीय फसल पद्धति के लिऐ उपयुक्त प्रजाति है।   
जे.एस. 95-60
यह जाति अतिशीध्र पकने वाली (82-88 दिन ) प्रजाति है। तथा इसकी उपज क्षमता 18-20 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर है । इसके विशेष लक्षणों में भालाकार पत्तियाँ बैंगनी फूल, रोम रहित तना, पत्ती तथा फली, चार दाने वाली फलियाँ, पीला तथा बड़ा दाना एवं धूसर रंग की नाभिका शामिल हैं । इसका पौधा परिमित वृद्वि वाला सीधा तथा बौना होता है, जिसके कारण यह गिरती नहीं है । यह प्रजाति कीटों में तना मक्खी, चक्रभृंग, नीला भृंग तथा बीमारियों में जड़ सड़न, राइज़ैक्टोनिया एरियल ब्लाईट, तथा जीवाणु धब्बे के लिए प्रतिरोधक पाई गई है । इस प्रजाति में सूखा, अधिक तापमान सहने तथा न चटकने का गुण है।यह जे.एस. 335 से 15 दिन पहले तथा जे.एस. 93-05 से 10 दिन पहले पक जाती है ।  
जे.एस. 97-52

यह व्यापक क्षेत्र के लिए अनुकूल है। यह मध्यम अवधि (98-102 दिन) एवं मध्यम दाने वाली प्रजाति है । यह प्रजाति विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अधिक उपज की क्षमता रखती हैं। इसमें बहुरोधी क्षमता है । यह प्रमुख रोगों  जैसे पीला मोज़ैक एवं जड़ सड़न, प्रमुख कीटों जैसे तना छेदक एवं पत्तिभक्षक एवं अधिक नमी के लिए रोधी एवं सहनशील है ।यह प्रजाति अपने आकारीय लक्षणों जैसे सफेद फूल, हल्के रंग की फल्लियां एवं तने, ताम्बिया रोयें एवं गहरी काली नाभि के समावेश के साथ विशिष्टता, समरूपता, एवं नवीनता रखती है। जे.एस. 97-52 के बीजों में अधिक अंकुरण एवं लम्बे समय तक भण्डारण के बाद भी वांछनीय अंकुरण देने की विेशेष क्षमता है।        

4 comments:

Dr. Chandrajiit Singh said...

बहुत ही उपयोगी जानकारी. सर को धन्यवाद!!!

Sanjay baghel said...

सोयाबीन की खेती करने बाले कृषकों को विशेषत: कीट नियंत्रण के सम्बन्ध में इतनी अच्छी जानकारों उपलब्ध कराने के लिए हम सर जी के आभारी हैं।

mangal gurjar said...

Bahut hi acchi jankari sir

Goverdhan Dayam said...

बहुत ही उपयुक्त जानकारी हे किसान भाई जरूर इस का उपयोग कर उत्पादन मे वृद्धी प्राप्त करेंगें ।
आप से अनुरोध हे की इस जानकारी को कृषि विस्तार अधिकारी और ग्राम सेवकों के माध्यम से गाँव गाँव तक पर्चे छपवा कर वितरित करें तो किसान भाई ज्यादा से ज्यादा लाभ ले सकेंगे।।
धन्यवाद