खाद्य एवं पोषण सुरक्षा हेतु हेतु कृषिका द्वारा मशरूम की भूमिरहित खेती

                    वर्षा ऋतु में खेतों तथा जंगलों में कई स्थानों पर मशरूम उगते हैं । इन्हें आम भाषा में धमोड़ी, पिहुरी अथवा कुकुरमुत्ता कहा जाता है । प्राचीन काल से ही मशरूम की कई किस्मों में से खाने योग्य किस्मों का चुनवा, मानव करना सीख गया था एवं अपनी रसोई में इसका कई प्रकार से उपयोग करना प्रारंभ कर चुका था । किन्तु मशरूम की खेती का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । जहाँ पूर्व में मशरूम को बादल के गरजने से उपजने वाली वनस्पति के रूप में ही देखा जाता था, वहीं आज आधुनिक कृषि विज्ञान तथा तकनीक के कारण इसे वर्ष में छह से नौ महीने तक उगाया जा सकता है । विशेषकर, मशरूम की खेती हेतु श्रेष्ठ समय, वर्षा ऋतु होती है जब वातावरण में पार्याप्त मात्रा में नमी और उपयुक्त तापमान विद्यमान होता है.
      मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसकी खेती भूमि-हीन कृषक एवं मजदूर भी कर सकते हैं क्योंकि इसकी खेती के लिये भूमि की आवश्यकता नहीं होती है। मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ एक रोचक तथ्य यह भी है कि इसकी उपज मात्र 21 दिन से ही प्राप्त होनी शुरू हो जाती है । अत:, मशरूम की खेती, भूख से जूझ रहे परिवारों खाद्य एवं पोषण सुरक्षा हेतु बहुत महत्वपूर्ण है.
            राष्ट्र की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण प्रतिव्यक्ति कृषि भूमि का आकार निरंतर कम होता जा रहा है । जिस वजह से केवल कृषि कार्य करना ही लाभकारी सौदा नहीं रह गया है । इस परिस्थिति में समझदारी इस बात में है कि कृषि से संबंधित अन्य व्यवसायों में भी कृषक / महिला कृषक हाथ आजमाये, जैसे पशुपालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन एवं मशरूम की खेती ताकि प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हो सके ।
मशरूम की अर्थिक विवेचना:
मशरूम के एक थैले को तैयार करने में लगभग रू. 8/- से 10 /- की लागत आती है । एक थैले से लगभग दो से सवा दो किलो ताज़़ा मशरूम प्राप्त होता है । बड़े शहरों में मशरूम के विक्रय दर रू. 50/- से 60/- तक प्राप्त होती है जिससे रू. 40/-  से  50/- की शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है ।
            छोटे स्तर पर अपने परिवार की खाद्य सुरक्षा के लिये भी मशरूम की खेती की जा सकती है । चार से छह सदस्यों के परिवार के लिये, एक बार की सब्ज़ी का मूल्य लगभग रू. 12/- से 14/- तक होता है । यदि घर पर ही  मशरूम उगाया जाय तो 300 से 400 ग्राम मशरूम की सब्ज़ी प्रति पॅालिथिन थैला प्राप्त की जा सकती है । मशरूम के एक थैले से इस प्रकार घर पर उगाई गई मशरूम की सब्जी का सेवन करके रू. 50/- से 60/- तक बचत की जा सकती है । इस प्रकार, बचत के रूप में शुद्ध आय, रू. 40/- से 50/- तक प्राप्त की जा सकती है ।
            मध्यप्रदेश के डिंडोरी ज़िले के ग्राम स्तरीय हाट तथा बाज़ारों में मशरूम का विक्रय ग्रामीणजनों के बीच होता है तथा इसकी विक्रय ईकाई मुट्ठी है । एक मुट्ठी में लगभग 80 से 100 ग्राम मशरूम आता है  तथा ग्रामीण जन एक मुट्ठी मशरूम रू. 5/- में क्रय करते हैं । यह मशरूम, विक्रेतागण आसपास के जंगलों से एकत्रित कर हाट बाज़ार में विक्रय हेतु लाते हंै । ग्रामीणों के बीच मशरूम की स्वीकार्यता एक स्वादिष्ट सब्जी़ के रूप में है । मशरूम से, यह, रूचिकर व्यंजन पकाते हैं ।  यह मशरूम मात्र वर्षा ऋतु में ही जंगलों में उगते हैं अतएव इनका क्रय विक्रय तथा उपयोग अभी तक इस ऋतु तक ही सीमित है । हालाँकि बड़े शहरों में इसकी खेती वर्ष भर, तापमान तथा आद्रता (नमी) को नियंत्रित कर, की जाती है । हमारे ग्रामीण अंचलों में थोड़ी सी मेहनत से इसे आठ से दस महीने तक आराम से उगाया जा सकता है जिससे ग्रामीणजनों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा निश्चित की जा सकती है ।
            मशरूम, उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग में समान रूप से प्रचालित है, किन्तु शाकाहारी मध्यम वर्ग इसे अपनाने में थोड़ा समय ले रहा है ।  हालाँकि, इस वर्ग में यह धीरे-धीरे अपना स्थान बना रहा है ।  यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि मशरूम एक कवक है तथा इसको वनस्पति ही माना जाता है एवं यह किसी भी प्रकार से माँसाहार नहीं हैं । इस भ्राँति के निराकरण हेतु एक उदाहरण यह भी है कि गायात्री परिवार के प्रमुख संत आचार्य श्रीराम शर्मा जी के स्वयं लिखित वांगमय कोष क्रमांक 39 में इस बात का उल्लेख किया है कि मशरूम का उपयोग एक पौष्टिक सब्ज़ी के रूप में किया जाना चाहिए । नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ न्यूट्रिशन (आई.सी.एम.आर.), हैदराबाद के द्वारा प्रकाशित तथा सी. गोपालन तथा उनके साथियों द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘न्यूट्रिटिव वैल्यू आॅफ इंडियन फूड्स’’ (भारतीय खाद्य पदार्थों के पोषक मान) में भी मशरूम को सब्ज़ी (वनस्पति) की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है ।

मशरूम का पोषक मान: 
            सौ (100) ग्राम ताज़े मशरूम में 88.5 ग्राम जलांश (नमी), 3.1 ग्राम उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन, 0.8 ग्राम वसा, 1.4 ग्राम खनिज लवण, 0.44 ग्राम रेशा, 4.3 ग्राम कार्बोज़, 33 किलो कैलोरी ऊर्जा, 6 मिली ग्राम कैल्शियम, 110 मिली ग्राम फाॅस्फोरस, 1.5 मिल ग्राम लौह तत्व उपस्थित होता है ।
मशरूम की खेती हेतु आवश्यक सामग्री:
मशरूम की खेती हेतु निम्नलिखित सामग्री आवश्यक है:
भूसा, फार्मेल्डिहाईड, बैविस्टिन, मशरूम की बीज (स्पॉन ), 14×18 इंच आकार की पॉलिथिन, 4×3 मीटर आकार की पॉलिथिन शीट (उपचारित भूसा पलट कर अतिरिक्त उपचार घोल बहाने हेतु), सुतली, टोंचा, ब्लेड, 2 बड़ी बाल्टी या टब, 1 मग, पीने योग्य स्वच्छ जल, साबुन, साफ तौलिया एवं झारा ।
मशरूम की खेती हेतु आवश्यक बातें:
तापमान एवं आद्रर्ता (नमी):
मशरूम की खेती के लिये आवश्यक तापमान एंव आद्रर्ता वर्षा ऋतु के प्राकृतिक तापमान एवं आद्रता (नमी) के समान ही होनी चाहिए । यह लगभग 25 से 35 डिग्री सैल्सियस तथा 80 से 90 प्रतिशत आद्रता (नमी) होती है। वर्षा ऋतु में यह स्थिति प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रहती है किन्तु वर्षा के उपरांत इस स्थिति का निर्माण निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है :
1.      मशरूम के थैले को स्वच्छ एवं सुरक्षित, अंधेरे, हवादार तथा ठंडे कमरे में रख कर तथा फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर ।
2.      मशरूम के थैले को दिन में कम से कम पाँच से छह बार तथा रात में दो से तीन बार पानी से (झारे द्वारा) सींच कर/ तर करके ।
3.      मशरूम की खेती, जून माह में पहली वर्षा के उपरांत से लेकर फरवरी माह के अन्त तक, करके ।
4.      बडें स्तर पर घास की अथवा खस की झोपड़ी बना कर, झोपड़ी की घास को गीला रखते हुये, फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर, झोपड़ी के भीतर तापमान तथा आद्रर्ता को नियंत्रित करते हुये मशरूम की खेती करके ।

 मशरूम कक्ष की स्वच्छता:
1.      मशरूम कक्ष वह कक्ष है जिसमें मशरूम के थैलों की भराई तथा बीज रोपित किया जाता है एवं इन थैलों को टाँगा जाता है ।
2.      बाहर उपयोग किये गये जूते-चप्पल, कक्ष के बाहर उतारें तथा कक्ष में प्रवेश करने हेतु उपयोग की जाने वाली चप्पल पहनकर ही प्रवेश करें । 
3.      मशरूम के थैलों को हाथ लगाने के पूर्व, अपने हाथ साबुन तथा स्वच्छ जल के अच्छी प्रकार धोयें ।
4.      हाथ धोने के उपरान्त फार्मल्डिहाईड के दो प्रतिशत घोल से हाथ धोयें ।
5.      मशरूम कक्ष में कार्य खत्म करने के उपरान्त कक्ष से बाहर आकर साबुन तथा स्वच्छ जल से अच्छी तरह हाथ फिर से धोयें ।
6.      यदि कमरों का फर्श पक्का हो तो अच्छी तरह बुहार कर फिनाईल से पोछा लगायें ।
7.      दीवारों पर लगे जाले हटायें तथा दीवारों को बुहार लें ।
8.      फार्मल्डिहाईड 1 सें 2 प्रतिशत तथा बैविस्टीन का 0.05 प्रतिशत का स्वच्छ जल में घोल बनायें तथा इस घोल का छिड़काव दीवारों पर करें ।
9.      चूहे इत्यादि के बिल को बंद करें । चूहे तथा अन्य कीड़े के मशरूम कक्ष में प्रवेश को रोकने के लिये दरवाजे, खिड़कियों तथा दीवारों के सूराखों तथा दरारों को बंद करें ।
10.  यदि मशरूम कक्ष की छत खपड़े (कबेलू) की हो तो खपडे़ के नीचे, स्वच्छ चादर (पाल) लगायें जिसे समय पर धो लें।
11.  यदि फर्श कच्ची हो तो उसे गोबर से अच्छी प्रकार लीप लें ।
12.  फर्श (कच्ची या पक्की) का उपचार करने के उपरान्त, छनी हुई बारीक रेत की लगभग छह इंच की पर्त बिछायें जिससे मशरूम कक्ष में ठंडक बनी रहेगी ।
13.  कक्ष में चूहा पकड़ने का पिंजरा अवश्य रखें ।
14.  मशरूम का पॉलिथिन थैला भरते समय तथा मशरूम की तुड़ाई करते समय बालों को धुले हुये कपड़े से कस कर बाँधे तथा महिलायें अपनी चूड़ियों को धुले हुये कपड़े से हाथ पर बाँध लें ।
15.  अन्जान व्यक्ति, पालतू अथवा अन्य जानवारों का प्रवेश मशरूम कक्ष में वर्जित रखें ।

मशरूम की खेती हेतु स्वच्छता:
व्यक्तिगत् तथा स्थान की स्वच्छता, मशरूम की खेती हेतु अत्यंत आवश्यक है । ज़रा सी चूक के कारण ज़हीरले अथवा न जा खाने योग्य मशरूम अथवा नींदा उगने आरंभ हो सकते हैं । स्वच्छता बनाये रखने हेतु निम्नलिखित कार्य करने चाहिये:
व्यक्तिगत् स्वच्छता:
1.      नेलकटर द्वारा नाखून अवश्य काटें ।
2.      शरीर को खरोंचने, खुजली करने, बालों में हाथ फिराने, थूकने, छीकनें, खाँसने, नाक पोछने, तम्बाकू खाने, बीड़ी अथवा सिगरेट पीने, जैसी गंदी आदतों से दूर रहें ।
3.      अच्छी गुणवत्ता के साबुन तथा स्वच्छ जल से स्नान करें तथा स्वच्छ सूखी तौलियें से शरीर पोंछे ।
4.      दाद, खाज, खुजली, खाँसी, जु़खाम जैसे रोगों का उपचार करवायें ।
5.      कपड़े धोने के उचित गुणवत्ता के साबुन अथवा डिटेर्जेंट पाऊडर से धुले हुये कपड़े धारण करें ।
मशरूम की खेती की विधि:
भूसे का उपचार:
मशरूम की खेती हेतु भूसे का उपचार नीचे दी गई दो विधियों से किया जा सकता है:
गैर रासायनिक उपचार:
1.      बारीक़, अपने स्वाभाविक प्राकृतिक रंग के भूसे का चुनाव करें । जो कि रोग तथा कीट रहित हो तथा जिसमें लकड़ी, मिट्टी, कंकड़, पत्थर अथवा काँच के टुकड़े उपस्थित न हों । 
2.      भूसे को आधे घंटे तक स्वच्छ, पीने योग्य जल में उबालें । उबालने के उपरान्त जल निथार कर, भूसे को ठंडा कर लें तथा इसका उपयोग करें ।
रासायनिक उपचार:
1.      स्वच्छ बाल्टी में, स्वच्छ पीने योग्य जल में दो प्रतिशत फार्मल्डिहाईड तथा 0.05 प्रतिशत बाविस्टीन का घोल बनायें ।
2.      इस घोल में भूसे को अच्छी, तरह डुबाकर, 12 घंटे तक रखें  ।
3.      बारह घंटे के उपरान्त भूसे को पानी से निकालकर ढाल वाले, छायादार तथा स्वच्छ स्थान पर पॉलिथिन शीट पर रखें । इस पॉलिथिन शीट को उपयोग करने के पूर्व, से उपचारित करें. ।
4.      पॉलिथिन शीट पर पर फैले हुये भूसे को दो घंटे तक रखें जिससे भूसे में उपस्थित अतिरिक्त उपचार घोल बहकर भूसे से अलग हो जाये।
स्पॉन  (बीज) रोपित करना:
1.      स्वच्छ तथा उपचार घोल से उपचारित एवं निथरे हुये पॉलिथिन बैग (लिफाफें) में दो अंगुल की भूसे की पर्त बिछायें।
2.      पर्त के ऊपर लिफाफे के किनारे मशरूम का बीज फैलायें ।
3.      बीज फैलाने के उपरांत, दो अंगुल ऊँची उपचारित भूसे की पर्त फैलायें ।
4.      इस पर्त के ऊपर पुनः मशरूम के बीज रोपित करें ।
5.      इस प्रकार पॉलिथिन ऊपर तक भर लें ।
6.      ऊपर तक भरने के उपरान्त पॉलिथिन बैग का मुँह सुतली से कस कर बाँध दे ।
मशरूम के थैले में छेद करना तथा टाँगना:
1.      उपचार घोल से उपचारित, सूखे टोंचे से पॉलिथिन बैग में छोटे-छोटे छेद, चारों ओर करें ।
2.      भरे हुये बैग को चारों ओर से सुतली से बाँधें तथा ऊपर की ओर सुतली का एक लूप बनायें ।
3.      सुतली के लूप के द्वारा इस बैग को इतनी ऊँचाई पर बाँधें, जितनी ऊँचाई पर आसानी से इन्हें सींचा जा सके तथा साथ ही यह बच्चों की पहुँच तथा पालतू जानवर एवं चूहों से दूर भी रहें ।
4.      स्वच्छ पीने योग्य जल को स्वच्छ झारे में भर कर पॉलिथिन बैग को दिन में पाँच से छह बार तथा रात में कम से कम तीन बार सीचें ।
5.      वर्षा ऋतु के उपरान्त, शुष्क मौसम में प्रति चैबीस घंटे, दो से तीन सिंचाई बढ़ायें ।
6.      व्यवसायिक स्तर पर मशरूम की खेती करने की स्थिति में, टपक सिंचाई पद्धति (ड्रिप इरिगेशन) का उपयोग भी मशरूम बैग की सिंचाई के लिये किया जा सकता है ।
7.      मशरूम की व्यवसायिक खेती की लिए हार्ड वाटर (लवण युक्त जल अथवा खारे पानी) का उपयोग न करें बल्कि मीठे जल का उपयोग करें ।

मशरूम के पॉलिथिन थैले को फाड़ना:
1.      माशरूम के पॉलिथिन थैले को भरने के इक्कीस दिन के उपरान्त (भूसा सफेद हो जाने के उपरान्त), उपचार घोल से उपचारित तथा सूखे हुये ब्लेड से, इस बैग को फाड़े तथा पॉलिथिन थैले को बाँधे हुये भूसे से अलग करें ।
2.      सुतली को भूसे के चारों ओर बँधे रहने दें जिसके द्वारा वह हवा में टँगा रहेगा ।
3.      सफेद रंग के बँधे तथा टंगे हुये भूसे को पहले की तरह ही सींचते रहें ।
मशरूम की फसल:
1.      मशरूम के पॉलिथिन थैले को भरने सेे पच्चीस से तीस दिन के पश्चात् मशरूम उगने प्रारंभ हो जायेगें ।
2.      मशरूम, फूल के रूप मे उगेगे जो कि सफेद रंग के होगें ।
3.      मशरूम के किनारे, जैसे ही बाहर की ओर मुड़ने आरंभ हों तथा किनारों का रंग भूरा होना प्रारंभ हो जाये, इन्हें घड़ी की दिशा में घुमा कर तोड़ लें ।
4.      ताजे मशरूम का उपयोग सब्ज़ी, भजिये, सूप एवं अचार आदि बनाने में करें ।
5.      बाद में उपयोग में लाने के लिये, मशरूम को धूप मे सुखा कर साफ वायुुरूद्ध डिब्बों में बंद करें ।
6.      मशरूम के जो फूल सफेद रंग के अतिरिक्त, अन्य रंग के हों उन्हें देखते ही, तुरंत तोड़ लें तथा मशरूम कक्ष के बाहर ले जा कर इन्हें नष्ट करें ।
7.      अनावश्यक किस्म के मशरूम (सफेद रंग के अतिरिक्त रंग के मशरूम) तथा भूसे में संक्रमण दिखने की स्थित में, स्वच्छ जल में तैयार 2 प्रतिशत बैवेस्टीन के घोल का छिड़काव मशरूम थैले पर करें ।
8.      एक बार में, मशरूम के एक थैले से एक तुड़ाई के दौरान 300 से 400  ग्राम की उपज प्राप्त होती है । प्रत्येक बैग 4-5 तुड़ाई तक की जा सकती है ।
मशरूम सुखाने की विधि:
1.      एक लीटर स्वच्छ पीने योग्य जल को उबालें लें तथा ठंडा कर लें । इस जल में एक तिहाई चाय के चम्मच के बराबर पोटैशियम मैटा बाइ सल्फाईट (के.एम.एस.पावडर) प्रति लीटर, अच्छी प्रकार मिलायें । इस घोल में मशरूम को पाँच मिनिट के लिये डुबायें ।
2.      घोल से मशरूम निकालकर, स्वच्छ स्थान पर, स्वच्छ पॉलिथिन शीट पर बिछा कर धूप में दो दिन तक सुखायें ।
3.      सूखे हुये मशरूम को वायुरूद्ध डिब्बे (ऐसे डिब्बे जिनमें हवा न जा सके ) में बंद कर के सुरक्षित स्थान पर रखें । जब आवश्यकता पड़ने पर सेवन करें. 


मक्का से अधिक उपज एवं आमदनी हेतु शस्य तकनीक

डॉ गजेन्द्र सिंह तोमर
प्राध्यापक
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय
                            कृषक नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़) 
मक्का विश्व की एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है। मक्का में विद्यमान अधिक उपज क्षमता  और  विविध उपयोग के कारण इसे खाधान्य फसलों की रानी कहा जाता है। पहले मक्का को  विशेष रूप से गरीबो  का मुख्य भोजन माना जाता था परन्तु अब ऐसा नही है । वर्तमान में इसका उपयोग मानव आहार (24 %) के  अलावा कुक्कुट आहार (44 % ),पशु आहार (16 % ), स्टार्च (14 % ), शराब (1 %) और  बीज (1 %) के  रूप में किया जा रहा है । गरीबों का भोजन मक्का अब अपने पौष्टिक गुणों के कारण अमीरों के मेज की शान बढ़ाने लगा है। मक्का के दाने में 10 प्रतिशत प्रोटीन, 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 4 प्रतिशत तेल, 2.3 प्रतिशत क्रूड फाइबर, 1.4 प्रतिशत राख तथा 10.4 प्रतिशत एल्ब्यूमिनोइड पाया जाता है। मक्का के  में भ्रूण में 30-40 प्रतिशत तेल पाया जाता है। मक्का की प्रोटीन में जीन  प्रमुख है जिसमें ट्रिप्टोफेन तथा लायसीन नामक दो आवश्यक अमीनो अम्ल की कमी पाई जाती है। परन्तु विशेष प्रकार की उच्च प्रोटीन युक्त मक्का में ट्रिप्तोफेंन   एवं लाईसीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो  गरीब लोगो को  उचित आहार एवं पोषण प्रदान करता है साथ ही पशुओ  के  लिए पोषक आहार है । यह पेट के अल्सर और गैस्ट्रिक अल्सर से  छुटकारा दिलाने में सहायक है, साथ ही यह वजन घटाने में भी सहायक होता है। कमजोरी में यह बेहतर ऊर्जा प्रदान करता है और बच्चों के सूखे के रोग में अत्यंत फायदेमंद है। यह मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखता है, दाँत मजबूत रखता है, और कार्नफ्लेक्स के रूप में लेने से हृदय रोग में भी लाभदायक होता है।मक्का के स्टीप जल में एक जीवाणु को पैदा करके इससे पेनिसिलीन दवाई तैयार करते हैं।
    अब मक्का को  कार्न, पॉप कार्न, स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न आदि अनेको  रूप में पहचान मिल चुकी है । किसी अन्य फसल में इतनी विविधता कहां देखने को  मिलती है । विश्व के अनेक देशो  में मक्का की खेती प्रचलित है जिनमें क्षेत्रफल एवं उत्पादन के हिसाब से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, चीन और  ब्राजील का विश्व में क्रमशः प्रथम, द्वितिय एवं तृतीय स्थान है । पिछले कुछ वर्षो  में मक्का उत्पादन के  क्षेत्र में भारत ने नये कीर्तिमान स्थापित किये है जिससे वर्ष 2010-11 में मक्का का उत्पादन 217.26 लाख टन के  उच्च स्तर पर पहुंच गया है एवं उत्पादकता 2540 किग्रा. प्रति हैक्टर के  स्तर पर है जो वर्ष 2005-06 की अपेक्षा 600 किलोग्राम . अधिक है । यही वजह है कि मक्का की विकास दर खाद्यान्न फसलो  में सर्वाधिक है जो  इसकी बढ़ती लोकप्रियता को  दर्शाती है । भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल में मक्का उगाने वाले  राज्यो  में कर्नाटक, राजस्थान एवं आन्ध्र प्रदेश आते है जबकि औसत  उपज के मान से आन्ध्र प्रदेश का देश में सर्वोच्च  (4873 किग्रा. प्रति हैक्टर) स्थान रहा है जबकि तमिलनाडू (4389 किग्रा)  का द्वितिय और  पश्चिम बंगाल  तृतीय (3782 किग्रा.) स्थान पर रहे है ।    छत्तीसगढ़ के सभी जिलो  में मक्के की खेती की जा रही है वर्ष 2009-10 के आँकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 171.22 हजार हेक्टेयर (खरीफ) और 15.59 हजार हेक्टेयर में (रबी) मक्का बोई गई जिससे क्रमशः 1439 1550 किग्रा. प्रति हेक्टेयर ओसत उपज दर्ज की गई।
भूमि का चयन एवं खेत की तैयारी
    मक्का की खेती लगभग सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमियों में की जा सकती है परन्तु अधिकतम पैदावार के लिए गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी  उत्तम होती है, जिसमे वायु संचार व जल निकास उत्तम हो तथा जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हों। मक्का की फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के मध्य ( अर्थात न अम्लीय और  न क्षारीय) उपयुक्त रहता हैं। जहाँ पानी जमा ह¨ने की सम्भावना ह¨ वहाँ मक्के की फसल नष्ट ह¨ जाती है । खेत में 60 से.मी के अन्तर से मादा कूंड पद्धति  से वर्षा ऋतु में मक्का की बोनी करना लाभदायक पाया गया है।
भूमि की जल व हवा संधारण क्षमता बढ़ाने तथा उसे नींदारहित करने के उद्देश्य  से ग्रीष्म-काल में भूमि की गहरी जुताई करने के उपरांत कुछ समय के लिये छोड़ देना चाहिए। पहली वर्षा होने के बाद खेत में दो बार देशी हल या हैरो से जुताई  करके मिट्टी नरम बना ल्¨ना चाहिए, इसके बाद पाटा चलाकर कर खेत समतल किया जाता है। अन्तिम जोताई के समय गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए ।
उन्नत किस्में
संकर किस्में: गंगा-1, गंगा-4, गंगा-11, डेक्कन-107, केएच-510, डीएचएम-103, डीएचएम-109, हिम-129, पूसा अर्ली हा-1 2, विवेक हा-4, डीएचएम-15 आदि
सकुल किस्में: नर्मदा मोती, जवाहर मक्का-216, चन्दन मक्का-1,2 3, चन्दन सफेद मक्का-2, पूसा कम्पोजिट-1,2 3, माही कंचन, अरून, किरन, जवाहर मक्का-8, 12 216 , प्रभात, नवजोत आदि ।
विशिष्ट मक्का की अच्छी उपज लेने के लिए निम्नलिखित उन्नत प्रजातियों के शुद्ध एवं प्रमाणित बीज ही बोये जाने चाहिए।
1.उत्तम प्र¨टीन युक्त मक्का (क्यूपूपूपीएम): एच.क्यू  पी.एम.1 एवं 5 एवं शक्ति-1 (संकुल)
2.पाप कार्न: वी. एल. पापकार्न, अम्बर, पर्ल एवं जवाहर
3.बेबी कार्न: एच. एम. 4 एवं वी.एल. बेबी कार्न-1
4.मीठी मक्का: मधुरप्रिया एवं एच.एस.सी. -1(संकर)- 70-75 दिन, उपज-110 से 120 क्विंटल  प्रति है., 250-400  क्विंटल  हरा चारा।
5.चारे हेतु: अफ्रीकन टाल, जे-1006, प्रताप चरी-6
बोआई का समय
    भारत में मक्का की बोआई वर्षा प्रारंभ होने पर की जाती है। देश के विभिन्न भागों में (खरीफ ऋतु) बोआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक का होता है। शोध परिणामों से ज्ञात होता है कि मक्का की अगेती बोआई (25 जून तक) पैदावार के लिए उत्तम रहती है। देर से बोआई करने पर उपज में गिरावट होती है। रबी में अक्टूबर अंतिम सप्ताह से 15 नवम्बर तक बोआई करना चाहिए तथा जायद में बोआई हेतु फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च तृतीय सप्ताह तक का समय अच्छा रहता है। खरीफ की अपेक्षा रबी में बोई गई मक्का से अधिक उपज प्राप्त होती है क्योंकि खरीफ में खरपतवारों की अधिक समस्या होती है, पोषक तत्वों का अधिक ह्यस होता है, कीट-रोगों का अधिक प्रकोप होता है तथा बदली युक्त मौसम केे कारण पौधों को सूर्य ऊर्जा कम उपलब्ध हो पाती हैं।जबकि रबी ऋतु में जल एंव मृदा प्रबंधन बेहतर होता है। पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक रहती है। कीट,रोग व खरपतवार प्रकोप कम होता है और फसल को प्रकाश व तापक्रम इष्टतम मात्रा में प्राप्त होता है।
सही बीज दर
    संकर मक्का का प्रमाणित बीज प्रत्येक वर्ष किसी विश्वसनीय संस्थान से लेकर बोना चाहिये। संकुल मक्का  के लिए एक साल पुराने भुट्टे के बीज जो  भली प्रकार  सुरक्षित रखे  गये हो , बीज के लिए अच्छे रहते है । पहली फसल कटते ही अगले  वर्ष बोने के लिए स्वस्थ्य फसल की सुन्दर-सुडोल बाले (भुट्टे) छाँटकर उन्हे उत्तम रीति से संचित करना चाहिए । यथाशक्ति बीज को  भुट्टे से हाथ द्वारा अलग करके बाली के बीच वाल्¨ दानो  का ही उपयोग अच्छा रहता है । पीटकर या मशीन द्वारा अलग किये गये बीज टूट जाते है जिससे अंकुरण ठीक नहीं होता ।  भुट्टे के ऊपर तथा नीचे के दाने बीच के दानो  की तुलना में शक्तिशाली नहीं पाये गये है । बोने के पूर्व बीज की अंकुरण शक्ति का पता लगा लेना अच्छा होता  है । यदि अंकुरण परीक्षण नहीं किया गया है तो प्रति इकाई अधिक बीज बोना अच्छा रहता है । बीज का माप, बोने की विधि, बोआई का समय तथा मक्के की किस्म के आधार पर बीज की मात्रा  निर्भर करती है ।  प्रति एकड़ बीज दर एवं पौध  अंतरण निम्न सारणी में दिया गया है ।
                                               
बिन्दु
सामान्य मक्का   
क्यू.पी.एम.
बेबी कार्न 
स्वीट कार्न
पाप कार्न   
चारा हेतु
बीज दर (किग्रा. प्रति एकड़)           
8-10 
8  
10-12
2.5-3
4-5
25-30

कतार से कतार की दूरी (सेमी)        
60-75        
60-75 
60
75 
60
30
पौधे  से पौधे  की दूरी (सेमी.)          
20-25        
20-22      
15-20           
25-30        
20
10
    ट्रेक्टर चलित मेज प्लांटर अथवा देशी हल की सहायता से  रबी मे 2-3 सेमी. तथा जायद व खरीफ में 3.5-5.0 सेमी. की गहराई पर बीज बोना चाहिए। बोवाई किसी भी विधि से की जाए परंतु खेत में पौधों की कुल संख्या 65-75 हजार प्रति हेक्टेयर रखना चाहिए। बीज अंकुरण के 15-20 दिन के बाद अथवा 15-20 सेमी. ऊँचाई ह¨ने पर अनावश्यक घने पौधों की छँटाई करके पौधों के बीच उचित फासला स्थापित कर खेत में इष्टतम पौध संख्या स्थापित करना आवश्यक है। सभी प्रकार की मक्का में एक स्थान पर एक ही पौधा  रखना उचित पाया गया है ।
बीज उपचार
    संकर मक्का के बीज पहले  से ही कवकनाशी से उपचारित ह¨ते है अतः इनको  अलग से उपचारित करने की आवश्यकता नहीं होती है । अन्य प्रकार के बीज को थायरम अथवा विटावेक्स नामक कवकनाशी  1.5 से 2.0 ग्राम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए जिससे पौधों क¨ प्रारम्भिक अवस्था में रोगों  से बचाया जा सके ।
बोआई की विधियाँ
मक्का बोने की तीन विधियाँ यथा छिटकवाँ, हल के पीछे और  डिबलर विधि प्रचलित है, जिनका विवरण यहां प्रस्तुत हैः
1.छिटकवाँ विधि:  सामान्य  तौर पर किसान छिटककर बीज बोते है तथा ब¨ने के बाद पाटा या हैरो  चलाकर बीज ढकते है । इस विधि से बोआई करने पर बीज अंकुरण ठीक से नहीं ह¨ पाता है, पौधे  समान और  उचित दूरी पर नहीं उगते  जिससे बांक्षित  उपज के लिए प्रति इकाई इश्टतम पौध  संख्या प्राप्त नहीं हो  पाती है । इसके अलावा फसल में निराई-गुड़ाई (अन्तर्कर्षण क्रिया) करने में भी असुविधा होती है । छिटकवाँ विधि में बीज भी अधिक लगता है ।
2. कतार बोनी : हल के पीछे कूँड में बीज की बोआई  सर्वोत्तम  विधि है । इस विधि में कतार से कतार तथा पौध  से पौध  की दूरी इष्टतम रहने से पौधो  का विकास अच्छा होता है । उपज अधिक प्राप्त होती है । मक्का की कतार बोनी के लिए मेज प्लान्टर का भी उपयोग किया जाता है ।
वैकल्पिक जुताई-बुवाई
        विभिन्न संस्थानो  में हुए शोध परिणामो  से ज्ञात होता है कि शून्य भूपरिष्करण, रोटरी टिलेज एवं फर्ब पद्धति जैसी तकनीको को  अपनाकर किसान भाई उत्पादन लागत को  कम कर अधिक उत्पादन ले सकते है ।
जीरो टिलेज या शून्य-भूपरिष्करण तकनीक
          पिछली फसल की कटाई के उपरांत बिना जुताई किये मशीन द्वारा मक्का की बुवाई करने की प्रणाली को जीरो टिलेज कहते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर खेत की जुताई करने की आवश्यकता नही पड़ती है तथा खाद एवम् बीज की एक साथ बुवाई की जा सकती है। इस तकनीक से चिकनी मिट्टी के अलावा अन्य सभी प्रकार की मृदाओं में मक्का की खेती की जा सकती है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है, परन्तु इसमें टाइन चाकू की तरह होता है। यह टाइन मिट्टी में नाली के आकार की दरार बनाता है, जिसमें खाद एवम् बीज उचित मात्रा में सही गहराई पर पहुँच जाता है।
फर्ब तकनीक से बुवाई
                 मक्का की बुवाई सामान्यतः कतारो  में की जाती है। फर्ब तकनीकी किसानों में प्रचलित इस विधि से सर्वथा भिन्न है। इस तकनीक में मक्का को ट्रेक्टर चलित रीजर-कम ड्रिल से मेंड़ों पर एक पंक्ति में बोया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के अनुसंधान में यह पाया गया हैं कि इस तकनीक से खाद एवम् पानी की काफी बचत होती है और उत्पादन भी प्रभावित नही होता हैं। इस तकनीक से बीज उत्पादन के लिए भी मक्का की खेती की जा रही है। बीज उत्पादन का मुख्य उद्देश्य अच्छी गुणवता वाले अधिक से अधिक बीज उपलब्ध कराना है।
खाद एंव उर्वरक
    मक्का की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित मात्रा में खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। मक्के को  भारी फसल की संज्ञा दी जाती है जिसका भावार्थ यह है कि इसे अधिक मात्रा  में पोषक तत्वो  की आवश्यकता पड़ती है । एक हैक्टर मक्के की अच्छी फसल भूमि से ओसतन 125 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फॉस्फ¨रस तथा  75 किलोग्राम पोटाश ग्रहण कर लेती है।अतः मिट्टी में इन प¨षक तत्वो  का पर्याप्त मात्रा  में उपस्थित रहना अत्यन्त आवश्यक है । भूमि में नाइट्रोजन की कमी होनेपर पौधा  छोटा और  पीला रह जाता है, जबकि फॉस्फ़ोरस कम होने पर फूल व दानो  का विकास कम होता है । साथ ही साथ जडो  का विकास भी अवरूद्ध ह¨ जाता है । भूमि में पोटाश की न्यूनता पर  कमजोर पौधे  बनते है, कीट-रोग का आक्रमण अधिक होता है । पौध  की सूखा सहन करने की क्षमता कम हो  जाती है । दाने पुष्ट नहीं बनते है । मक्के की फसल में 1 किग्रा नत्रजन युक्त उर्वरक देने से 15-25 किग्रा. मक्के के दाने प्राप्त होते हैं। मक्के की फसल में पोषक तत्वो  की पूर्ति के लिए  जीवाशं तथा रासायनिक खाद का मिलाजुला  प्रयोग बहुत लाभकारी पाया गया है। खाद एंव उर्वरकों की सही व संतुलित मात्रा का निर्धारण खेत की मिट्टी परीक्षण के बाद ही तय किया जाना चाहिए।
    मक्का बुवाई से 10-15 दिन पूर्व 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। मक्का में 150 से 180 किलोग्राम नत्रजन, 60-70 किलो ग्राम फास्फ़ोरस, 60-70 किलो ग्राम पोटाश तथा 25 किलो ग्राम जिंक सल्पेट प्रति हैक्टर देना उपयुक्त पाया गया है। संकुल किस्मो  में नत्रजन की मात्रा  उपरोक्त की 20 प्रतिशत कम देना चाहिए । मक्का की देशी किस्मो  में नत्रजन, स्फुर व पोटाश की उपरोक्त मात्रा  की आधी मात्रा  देनी चाहिए । फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा तथा 10 प्रतिशत नाइट्रोजन को  आधार डोज (बेसल) के रूप में बुवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की मात्रा को चार हिस्सों में निम्नलिखित विवरण के अनुसार देना चाहिए।
20 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में चार पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।
30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में 8 पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।
30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल पुष्पन अवस्था में हो या फूल आने के समय देना चाहिए तथा
10 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग दाना भराव के समय करना चाहिए।
सिचाई हो समय पर
    मक्के की प्रति इकाई उपज  पैदा करने के लिए अन्य फसलो  की अपेक्षा अधिक पानी लगता है । शोध परिणामों में पाया गया है कि  मक्के में वानस्पतिक वृद्धि (25-30 दिन) व मादा फूल आते समय (भुट्टे बनने की अवस्था में) पानी की कमी से उपज में काफी कमी हो जाती है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए मादा फूल आने की अवस्था में किसी भी रूप से पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। खरीफ मौसम में अवर्षा की स्थिति में आवश्यकतानुसार दो से तीन जीवन रक्षक सिंचाई चाहिये।
    छत्तीसगढ़ में  रबी मक्का के लिए 4 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि 6 सिंचाई की सुविधा हो तो 4-5 पत्ती अवस्था, पौध  घुटनों तक आने  से पहले व तुरंत बाद, नर मंजरी आते समय, दाना भरते समय तथा दाना सख्त होते समय सिंचाई देना लाभकारी रहता है। सीमित पानी उपलब्ध होने पर एक नाली छोड़कर दूसरी नाली में पानी देकर करीब 30 से 38 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। सामान्य तौर पर मक्के के पौधे 2.5 से 4.3 मि.ली. प्रति दिन जल उपभोग कर लेते है। मौसम के अनुसार मक्के को पूरे जीवन काल(110-120 दिन) में 500 मि. ली. से 750 मि.ली. पानी की आवश्यकता होती है। मक्के के खेत में जल भराव  की स्थिति में फसल को भारी क्षति होती है। अतः यथासंभव खेत में जल निकाशी की ब्यवस्था करे।
खरपतवारो से फसल की सुरक्षा
    मक्के की फसल तीनों ही मौसम में खरपतवारों से प्रभावित होती है। समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने से मक्के की उपज में 50-60 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। फसल खरपतवार प्रतियोगिता के लिए बोआई से 30-45 दिन तक क्रांन्तिक समय माना जाता है। मक्का में प्रथम निराई 3-4 सप्ताह बाद की जाती है जिसके 1-2 सप्ताह बाद बैलो  से चलने वाले  यंत्रो  द्वारा कतार के बीच की भूमि गो ड़ देने से पर्याप्त लाभ होता है । सुविधानुसार दूसरी गुड़ाई कुदाल आदि से की जा सकती है । कतार में बोये गये पौधो  पर जीवन-काल में, जब वे 10-15 सेमी. ऊँचे हो , एक बार मिट्टी चढ़ाना  अति उत्तम होता है । ऐसा करने से पौधो  की वायवीय जड़ें  ढक जाती है तथा उन्हें  नया सहारा मिल जाता है जिससे वे लोटते (गिरते)नहीं है । मक्के का पोधा  जमीन पर लोट   जाने पर साधारणतः टूट जाता है जिससे फिर कुछ उपज की आशा रखना दुराशा मात्र ही होता है ।
प्रारंम्भिक 30-40 दिनों तक एक वर्षीय घास व चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों  के नियंत्रण हेतु एट्राजिन नामक नीदनाशी 1.0 से 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद खेत में छिड़कना चाहिए। खरपवारनाशियो  के छिड़काव के समय मृदा सतह पर पर्याप्त नमी का होना आवश्यक रहता है। इसके अलावा एलाक्लोर 50 ईसी (लासो) नामक रसायन 3-4 लीटर प्रति हक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में मिलाकर बोआई के बाद खेत में समान रूप से छिड़कने से भी फसल में 30-40 दिन तक खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। इसके बाद 6-7 सप्ताह में एक बार हाथ से निंदाई-गुडाई व मिट्टी चढ़ाने का कार्य करने से मक्के की फसल पूर्ण रूप से खरपतवार रहित रखी जा सकती है।
कटाई-गहाई
    मक्का की प्रचलित उन्नत किस्में बोआई से पकने तक लगभग 90 से 110 दिन तक समय लेती हैं। प्रायः बोआई  के 30-50 दिन बाद ही मक्के में फूल लगने लगते है तथा 60-70 दिन बाद ही हरे भुट्टे भूनकर या उबालकर खाने लायक तैयार हो  जाते है । आमतौर पर  संकुल एंव संकर मक्का की किस्मे पकने पर भी हरी दिखती है, अतः इनके सूखने की प्रतिक्षा न कर भुट्टो कर तोड़ाई करना  चाहिए।     एक आदमी दिन भर में 500-800 भुट्टे तोड़ कर छील सकता है । गीले भुट्टों  का ढेर लगाने से उनमें फफूंदी  लग सकती है जिससे दानों की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अतः भुट्टों को छीलकर धूप में तब तक सुखाना चाहिए जब तक दानों में नमी का अंश 15 प्रतिशत से कम न हो जाये। इसके बाद दानों को गुल्ली से अलग किया जाता है। इस क्रिया को शैलिंग कहते है।
उपज एंव भंडारण
    सामान्य तौर पर सिंचित परिस्थितियों में संकर मक्का की उपज 50-60 क्विंटल ./हे. तथा संकुल मक्का की उपज 45-50 क्विंटल ./हे. तक प्राप्त की जा सकती है। मक्का के भुट्टो  की पैदावार लगभग 45000-50000 प्रति हैक्टर अती है । इसके अलावा 200-225 क्विंटल हरा चारा प्रति हैक्टर भी प्राप्त होता है ।